Rohit Sardana asked SC Judges, “Why do you scare of Muslims so much?”


Rohit Sardana is the anchor on Zee News. He carries out a debate show called Taal Thok Ke. Rohit Sardana is known for his wit and amazing question and answers. In just no time he has made his mark in the fore of Journalism. He is one of the best Hindi TV anchors who conduct debates.

These days two judgments are prevalent which came from our honorable Supreme Court. One of the Judgement is Ban on the sale of Fire Crackers in Delhi and NCR while the other Judgement is that Supreme Court has said if a minor girl gets married and if her husband has sex with her without her consent then it will be termed as rape.

On these Two Issues, Rohit Sardana wrote two articles and the crux of both the articles is the same that why our courts fail to take a decision when Muslim Community is involved.

Just read the articles:

One Fire Cracker Debate he wrote:

दीपावली आ गयी है. अदालत का आदेश भी आ गया है. दिल्ली और आस पास पटाखे नहीं बिकेंगे. प्रदूषण होता है. होता ही है, इसमें कोई शक नहीं.

लेकिन प्रदूषण तो डीज़ल वाली गाड़ियों से भी होता है! जिनपे रोक लगाने की कोई भी मुहिम कार लॉबी के दबाव में दम तोड़ जाती है.

न्याय की देवी की आँख पे पट्टी बंधी रहती है. उसे कुछ दिखायी नहीं देता. लिहाज़ा फ़ैसला तर्कों और सुनी गयी दलीलों के आधार पे होता है. लेकिन जल्लीकट्टू के घायल बैलों की चीख़ पुकार सुन लेने वाली देवी, बक़रीद पे बलि चढ़ने वाले बकरों की करूण पुकार क्यों नहीं सुन पाती?

दलीलों को तराज़ू पे तौलने वाली इंसाफ़ की देवी को दही हांडी के उत्सव में बच्चों को लगने वाली चोट तो महसूस होती है, लेकिन मुहर्रम के जुलूसों में ख़ून बहाते लोगों पे उसका दिल क्यों नहीं पसीजता ?

होली आते ही पानी बर्बाद ना करने की क़समें देने वाले लोग आइपीएल के मैच तो चाव से देख आते हैं जिसके चौव्वन मैच हरी घास पे खेले जाएँ इसके लिए अरबों लीटर पानी बहा दिया जाता है.

देश में कहीं दुर्गा पूजा मनाने के लिए अदालत से दख़ल माँगना पड़ रहा है. कहीं सरस्वती पूजा मनाने के लिए. ऐसे में लोग ये सवाल तो पूछेंगे ही कि संविधान ने तो सबको अपना अपना धर्म मानने और तीज त्यौहार मनाने की छूट दी थी, हमारी आज़ादी कहाँ है?

And on the other Judgement Rohit Sardana Wrote:

सुप्रीम कोर्ट ने शादीशुदा नाबालिग लड़की से वैवाहिक संबंधों को बलात्कार की संज्ञा दी है. बाल विवाह के खिलाफ़ कानून है फिर भी बाल विवाह हो रहे हैं. ऐसे में,अदालत का ये फैसला ऐसी लड़कियों के लिए एक और मज़बूत हथियार का काम करेगा, जो बाल विवाह के खिलाफ़ कानून होने के बावजूद शादी के बंधन में बांध दी जाती हैं.

इस सारी बहस के बीच एक सवाल कहीं दब गया है कि एक ही देश में लड़की के जवान होने की या उसकी शादी होने की उम्र – बायोलॉजिकल आधार पर तय की जानी चाहिए या पंडित/मौलवी तय करेंगे ?

देश के कानून के मुताबिक़ – लड़की की शादी की उम्र 18 साल है. लड़के की शादी की उम्र 21 साल है. इससे कम उम्र का दूल्हा या दुल्हन हो तो शादा नाजायज़ मानी जाएगी.

हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक़, लड़की के लिए शादी की उम्र 18 साल है. 1978 तक ये उम्र 15 साल मानी गई थी. लेकिन बाल विवाह रोकथाम अधिनियम में संशोधन के बाद इस उम्र को बढ़ा कर 18 साल किया गया. सिख, जैन, बौद्ध, हिंदू – सभी शादियों को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत ला कर लड़के-लड़की दोनों की शादी की उम्र 21 और 18 साल तय की गई.

लेकिन शरिया कानून में 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी मान्य है. जून 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट और दिसंबर 2014 में गुजरात हाईकोर्ट ये कह चुकी है कि इस्लामिक कानून के मुताबिक़, 15 साल के ऊपर की लड़की ने अगर ‘Puberty’ हासिल कर ली है तो उसकी शादी जायज़ है. हालांकि बालिग होने के बाद लड़की ऐसी शादी के खिलाफ़ अपील कर सकती है.

अब सवाल ये है कि लड़की ने Puberty यानि यौवन की दहलीज़ छू ली है – इसका फैसला कौन करेगा ? मां-बाप ? डॉक्टर? गली मोहल्ले के लोग ? या मौलाना ?

लड़की जवान हुई या नहीं, इसका फैसला भी क्या धर्म के आधार पर ही होगा? अगर हिंदू या सिख लड़की है – तो अट्ठारह में जवान होगी और मुसलमान है तो 15 पार होते ही जवान हो जाएगी ?

देश में एक संविधान है, लेकिन एक कानून नहीं. शादी की उम्र तय नहीं कर सकते माई लॉर्ड, कम से कम लड़की के ‘जवान’ होने की उम्र तो तय कर दीजिए!

The crux is why SC fails to take a decision when Muslims are involved? Is this the secularism of our Courts? Why should Hindus remain tolerant every time?

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